हम सभी के जीवन में प्रार्थनाओं का महत्त्व बहुत अधिक रहा है। यही कारण है कि शुरुआत से ही प्रार्थनाएं हमारे जीवन का केंद्र बनी रही हैं। फिर वह विद्यालय में कक्षाओं के शुरू और अंत में नैतिक मूल्यों और देशभक्ति से ओतप्रोत गीत हों या फिर हर दिन सुबह और सांध्य बेला में भजन मंडलियों, दोस्तों और परिवार के साथ लयबद्ध कर भक्ति रस, काव्य रस तो कभी क्षेत्रीय बोलियों में डूबी रचनाएं हों। प्रार्थनाएं हमें कभी कबीर, रहीम, मीरा के दोहों से गुजरने का मौका देती हैं तो कभी रैदास, नानक, सूफी जैसे महान संतों, चिंतकों के बीच बैठा देती हैं। हम निर्गुण भजनों के अर्थों को समझ जीवन में ठहराव महसूस करने लगते हैं, जैसे विचलित मन को किसी ने सही दिशा में एकाग्रचित्त कर दिया हो। प्रार्थनाएं कलात्मक होती हैं। फिल्मों में भी लगातार प्रार्थनाओं का उपयोग किया गया है, जो बहुत लोकप्रिय भी हुईं।
यकीनन जहां प्रार्थनाएं की जा रही होती हैं, वहां मनुष्य के भीतर के अच्छे गुणों को उभरने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं। हम यहां लाउडस्पीकर पर शोर मचाती, अपनी भव्यता, विलासिता सबको दिखाने, खुद को श्रेष्ठतर साबित करने की होड़ में कोलाहल में तब्दील हो चुकी प्रार्थनाओं, भजनों की बात नहीं कर रहे हैं। वे तो बस मनुष्य की जिद को संतुष्ट करने के लिए किए जा रहे हैं, जो कि केवल मैं और मेरे तक ही सीमित हैं। जबकि प्रार्थनाएं पूरी सृष्टि को अपना समझने की उदारता हमारे भीतर लेकर आती हैं।
हम सादगी में लिपटी उन मद्धिम ध्वनि तरंगों की बात कर रहे हैं, जो हमें मनुष्यता, भाईचारे का पाठ पढ़ा जाती हैं। प्रार्थनाएं आध्यात्मिक रूप से मनुष्य को बेहतर इंसान बनाने के लिए हमेशा से कार्यरत रही हैं। वे हमारे भीतर का उजला पक्ष रेखांकित कर देती हैं, हम अपने आप को एक बेहतर इंसान के रूप में महसूस करने लगते हैं। उनके होने से आबोहवा स्वस्थ, सुंदर और निर्मल हो जाती है। अहंकार से इंसान को मुक्त कर विनम्रता और प्रेम से सराबोर कर देती हैं। प्रार्थनाएं वर्गों में विभाजित नहीं होतीं, समूची मनुष्य जाति के कल्याण के लिए होती हैं।
अगर हमारी प्रार्थनाएं करुणा, भाईचारा, प्रेम, सहिष्णुता उत्पन्न करने में विफल हो रही हैं, तो हमें समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं उनके वास्तविक रूप और उद्देश्य को स्वार्थपूर्ति के चलते बदल दिया गया है। अब हम प्रार्थना नहीं कर रहे हैं। हम किसी रणनीति का शिकार हो चुके हैं। प्रार्थना केवल आध्यात्मिक या धार्मिक शब्द ही नहीं है, यह आधिकारिक शब्द भी है। हम सभी को प्रार्थना पत्र लिखना शिक्षा के शुरुआती दौर में ही सिखा दिया गया था जो भविष्य को लेकर विद्यार्थियों को सुनिश्चित करता है कि वे एक सभ्य समाज में हैं, जहां अगर प्रार्थना की शैली में पत्र लिखा जाए, तो उस पर चिंतन किया जाएगा। अगर ऐसा नहीं हो पा रहा है, तो हमें सोचना चाहिए कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है।
प्रार्थना केवल एक शब्द ही नहीं है, वह जीवन जीने का तरीका है। हम एक दूसरे को किस तरह से संबोधित करते हैं, यह जानकर कोई हमारे समाज का बुनियादी ढांचा, जैसे कि हमारी कार्यप्रणाली, शिष्टाचार, एकजुटता और भविष्य में हमारी प्रगति की संभावना के बारे में भी अनुमान लगा सकता है। प्रार्थना के पर्यायवाची शब्दों पर गौर करें, तो पाएंगे कि ये वही शब्द हैं, जिनके उपयोग से हम अपनी बात को संयमित और संतुलित तरीके से दूसरे के समक्ष प्रस्तुत कर रहे होते हैं।
अनुरोध, निवेदन, विनती आदि ये शब्द सभ्य समाज के मालूम होते हैं। जहां निवेदन होता है, वहां यह उम्मीद भी होती है कि विचार-विमर्श और बेहतरी की संभावनाएं अभी बची हुई हैं। एक स्वस्थ प्रणाली मौजूद है, जिस पर हम अपने विचारों को इस विश्वास के साथ साझा कर सकते हैं कि उन पर ईमानदारी से, बिना पूर्वाग्रह के, निष्पक्ष रूप से विमर्श किया जाएगा। स्वस्थ और प्रगतिशील समाज की नींव इन्हीं शब्दों के होने से संभव कही जा सकती है।
पारिवारिक आत्मीय संबंधों की बात हो या औपचारिक नौकरी पेशे से जुड़ी व्यवहार कुशलता की, प्रार्थनाओं का असर प्रभावपूर्ण रहा है। किसी भी काम को करवाने के मुख्य रूप से दो तरीके संभव हैं- या तो आदेश दिया जाए या फिर निवेदन किया जाए। आदेशात्मक शैली में अनिवार्यता का भाव रहता है, जो काम के हो जाने को लेकर हमें निश्चिंत कर देता है। वहीं अनुरोध का भाव ऐसा वातावरण निर्मित कर देता है, जहां काम के प्रति व्यक्तिगत जिम्मेदारी और अपनेपन का भाव उत्पन्न होने लगता है।
व्यक्तिगत रूप से व्यक्ति जब अपने काम में सम्मिलित हो जाता है, तब बार-बार निरीक्षण करने की जरूरत कम हो जाती है। इस तरह के वातावरण में मिले परिणाम में गुणवत्ता लगातार बनी रहती है, साथ ही व्यक्तिगत खुशी, आत्मसम्मान और संतुष्टि का भाव भी बना रहता है। ऐसे में संतुष्ट व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को भी बेहतर वातावरण देने की कोशिश करने लगता है, इस तरह से समाज और दुनिया धीरे-धीरे स्वस्थ और सुंदर होती चली जाती है। घर, मुहल्ले, शहरों, छोटे-छोटे समूहों से शुरू हुई यह प्रार्थनाएं मनुष्य के जीवन के लगभग हर पक्ष को छूती हैं। यह ध्यान रखने योग्य है कि हमारी प्रार्थनाएं अपने उद्देश्य से कभी भटक न पाए। उम्मीदों और सामाजिक सरोकार से भरी प्रार्थनाओं को जीवन में हमेशा बने रहना चाहिए।
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